पुरानी अलमारी साफ़ करते हुए उसे एक पीला पड़ा लिफ़ाफ़ा मिला। ऊपर उसका नाम लिखा था और नीचे वही परिचित लिखावट थी, जिसे वह वर्षों पहले भूल जाने की कोशिश कर चुका था।
उसने काँपते हाथों से पत्र खोला।
“कुछ रिश्ते ख़त्म नहीं होते, वे बस हमारी ज़िंदगी से चुपचाप दूर चले जाते हैं।”
कुछ पंक्तियाँ पढ़ते-पढ़ते उसकी आँखें नम हो गईं। बाहर शाम उतर रही थी और कमरे में बीते हुए वर्षों की ख़ामोशी फैल रही थी।
पत्र के अंत में केवल एक वाक्य था—
“जब कभी लौटना, तो शिकायतें साथ मत लाना।”
उसने पत्र मोड़ा, सीने से लगाया और पहली बार महसूस किया कि कुछ विदाइयाँ वास्तव में कभी पूरी नहीं होतीं।





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