हिन्दी माँ की बोली है , प्यार की गाथा है,
संस्कारों की ये मधुर परिभाषा है ।
शब्दों का ये अनुपम हार है ,
स्नेह समरसता, संस्कृति का सार है ।
इसमे कबीर की साखी है, तुलसी के दोहे हैं
मीरा की भक्ति है तो दिनकर के शोले हैं ।
सूरदास की मधुर रसधारा है ,
भारत का गौरव हिन्दी हमारा है ।
साँसों में रचती है, दिल में बसती है,
जन-जन के मन को सहज लुभाती है।
इसकी सरल-सुबोध सुगंधित वाणी है ,
इसकी अनूठी सबसे अलग कहानी है ।



Comments (0)
Join the conversation with fellow authors.
Login to your Author Account to comment, like comments and reply.